वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावक की भुमिका
बीना1, प्रो. (डॉ.) सुषमा सिंह2
1वरिष्ठ शोध अध्येता, गृह विज्ञान विभाग, ज्वालादेवी विद्या मंदिर पी0 जी0 कॉलेज, कानपुर
2शोध निर्देशिका गृह विज्ञान विभाग, ज्वालादेवी विद्या मंदिर पी0 जी0 कॉलेज, कानपुर
*Corresponding Author E-mail: beenagupta0614@gmail.com, perfectsushma6@gmail.com
ABSTRACT:
प्रस्तुत शोध पत्र एक वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों की भुमिका पर केंद्रित है | जो एक अत्यन्त गम्भीर समस्या है क्योंकि वाहन चलाने वाला यदि दुर्घटना करता है तो सिर्फ वही प्रभवित नहीं होता उसके साथ साथ उसका पूरा परिवार प्रभावित होता है | साथ ही साथ यदि किसी अन्य से गाड़ी या व्यक्ति से टक्कर लगाता है तो सामने वाला भी इससे प्रभावित होता है | अतः कभी भी मद्यपान की स्थिति में वाहन नहीं चलाना चाहिए | मद्यपानी अभिभावक को एक वाहन चालक के रूप में उसके विविध पक्ष जैसे आर्थिक, मानसिक, शारीरिक आदि पक्षों पर पड़ने वाले प्रभाव का यथोचित गुणात्मक और मात्रात्मक अध्ययन करने का संभवतः प्रयास किया गया है | प्रस्तुत शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य मद्यपानी माता पिता को मद्यपान से दूर रखना और एक मद्यपान मुक्त वाहन चालक के रूप में रखना है | जिससे सुल्तानपुर जिले में यथा सम्भव दुर्घटनाओं को रोका जा सके | प्रस्तुत शोध पत्र में प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक, स्रोतों के माध्यम से आंकड़ों को संकलित किया गया है | प्रस्तुत शोध से सम्बंधित समस्या के विषय में जानकारी प्राप्त करने हेतु साक्षात्कार एवं प्रश्नावली का विधिवत प्रयोग किया गया है | प्रस्तुत शोध पत्र में वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों की भुमिका पर सूक्ष्म अध्ययन किया गया है | प्रस्तुत शोध पत्र में सम्बंधित समस्या की टिप्पणी प्रस्तुत की जायेगी, जिसके परिणाम स्वरूप एक उचित निष्कर्ष प्राप्त हो सके | प्रस्तुत शोध पर व्याख्यात्मक और विश्लेषणात्मक अनुसंधान पर आधारित है |
KEYWORDS: वाहन चालक, अभिभावक, मद्यपान
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बच्चों पर उनके अभिभावकों एवं परिवार के अन्य दूसरे सदस्यों के क्रियाकलाप का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है | बच्चे के सर्वांगीण विकास हेतु उसके परिवार के सभी सदस्य महत्वपूर्ण भुमिका निभाते हैं | मद्यपान का अपराध के साथ एक अटूट सम्बन्ध होता है | मद्यपान की स्थिति में व्यक्ति को उचित, अनुचित का बोध ही नहीं होता है | वर्तमान समय में भारत अत्यन्त विकसित हो गया है | प्राचीन काल में एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने के लिए यातायात के ज्यादा साधन नहीं होते थे | लोग प्रायः घोडागाड़ी, उंटगाड़ी, बैलगाड़ी आदि का ही प्रयोग करते थे, थोड़ा और समय बदला तो साइकिल का लोग प्रयोग करने लगे जिसके कारण यातायात सम्बन्धी दुर्घटनाएं नहीं होती थी | परन्तु अब आधुनिकता के युग में ऐसा नहीं है लोगों के पास एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए बहुत सारे यातायात के साधन हो गये हैं जो आधुनिक युग की मांग हैं | जिसके फलस्वरूप यातायात कर साधन में वृद्धि होने के कारण दुर्घटनाओं में भी वृद्धि हो गयी है | यदि व्यक्ति मदिरा के नशे में धुत होगा तो उसकी सभी ज्ञानेंद्रियाँ उचित रूप से काम नहीं करेंगी | यदि वो मद्य के नशे में गाड़ी चलाएगा तो यकीनन कहीं न कहीं दुर्घटना को अंजाम देगा वैसे तो मद्यपान की स्थिति में गाड़ी चलाना एक कानूनन जुर्म है | फिर भी मद्यपानी लोग इस अपराध को अंजाम देते ही हैं |
मद्यपान की स्थिति में गाड़ी चलाने सम्बन्धी नियम
कोई भी व्यक्ति जिसके खून में 100 मिली लीटर खून में 30 मिली ग्राम से ज्यादा एल्कोहल पाया जाता है एवं जिसके सांस में विश्लेषण के द्वारा यह पता चलता है कि उसने मद्यपान किया है तो ऐसे व्यक्ति के लिए कानूनन सजा का प्रावधान है | और यही बात किसी ऐसे व्यक्ति पर भी सामान्यतः लागू होती है जो मद्य के इस हद तक प्रभाव में है कि वह गाड़ी चलाने के उचित नियन्त्रण को रखने में असमर्थ होता है |
मद्यपान करके गाड़ी चलाने सम्बन्धी सजा
वर्तमान में भारत में मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 185 के तहत भारत में नशे की स्थिति में वाहन चलाना एक गम्भीर अपराध है | मोटर वाहन अधिनियम के अनुसार मद्य में धुत व्यक्ति या मद्यपान की स्थिति में वाहन चलाने पर प्रथम बार 6 माह तक की जेल और 2000 रुपये तक के जुर्माने से दंडित होगा | और यदि वह यह अपराध दूसरी बार दोहराता है तो उसको 2 साल की जेल और 3000 रुपये का जुर्मना देना होगा |
यदि मद्यपानी अभिभावक ऐसा करते हैं तो इसका सीधा प्रभाव उनके बच्चों पर पड़ता है जिसका अनुसरण करते हुवे वे भी मद्यपान की स्थिति में वाहन चलाने लगेंगे जिसके कारण दुर्घटनाओं में वृद्धि होगी | जिसके फलस्वरूप अपराध में भी वृद्धि होगी | क्योंकि बच्चे ही अपने अभिभावकों का अनुसरण करते हैं | भारत में वाहन चलाने के लिए एक उम्र का निर्धारण किया गया है उसी उम्र के ऊपर के लोग ही वाहन चला सकते हैं | यदि 18 वर्ष के कम उम्र का कोई किशोर या किशोरी वाहन चलाते हैं तो यह एक दंडनीय अपराध हैं | हमारे देश में वाहन चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस का होना अनिवार्य है चाहे वह किसी कि उम्र का हो और 18 वर्ष के नीचे की उम्र का ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनता है | बिना ड्राइविंग लाइसेंस के वाहन चालाना एक दंडनीय अपराध है |
अध्ययन क्षेत्र
शोध क्षेत्र शोध समस्या हेतु शोध क्षेत्र के रूप में भारत देश के उत्तर प्रदेश राज्य के सुल्तानपुर जिले को चुना गया है | 2011 में सुल्तानपुर क्षेत्र में हुई जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसंख्या 3,797,117 थी | वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों की भुमिका शीर्षक का अध्ययन किया जाएगा |
समस्या का चयन प्रस्तुत शोध विषय वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों की भुमिका समस्या का चयन किया गया है | वर्तमान काल में वाहन दुर्घटना की समस्या एक प्रमुख समस्या में से एक है यातायात से हुई दुर्घटना व्यक्ति को मृत्यु द्वार तक भी ले जा सकती है | और यदि वह घर का मुखिया है तो इसका सीधा प्रभाव उसके समस्त घर वालों पर पड़ेगा | इसलिए गृह विज्ञान विषय की शोध छात्रा और क्षेत्र सुल्तानपुर में निवास करने के कारण शोध शीर्षक वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों की भुमिका के लिए उपाय हेतु उत्सुकता की वजह से शोध छात्रा ने इस शोध समस्या का चयन किया है |
उद्देश्य
1. वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों के नकारात्मक योगदान का अध्ययन करना |
2. मद्यपान की स्थिति में अभिभावकों के वाहन चालक सम्बन्धी कुसमायोजन का अध्ययन करना |
3. सुल्तानपुर जिले में मद्यपान के कारण बढ़ते यातायात सम्बन्धी दुर्घटनाओं का अध्ययन करना |
उपकल्पना
1. वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों का समाज पर नकरात्मक प्रभाव पड़ता है |
2. मद्यपान की स्थिति में मद्यपानी अभिभावक वाहन चालक सम्बन्धी कुसमायोजन करते हैं |
3. सुल्तानपुर जिले में मद्यपान के कारण यातायात सम्बन्धी दुर्घटनाओं में वृद्धि हुई है |
साहित्यावलोकन
प्रस्तुत शोध पत्र भारत देश के राज्य उत्तर प्रदेश के जिले सुल्तानपुर के संदर्भ में वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों की भुमिका यह एक गृह विज्ञान विषय का अध्ययन है | वैसे तो आधुनिक युग में इस विषय पर पर्याप्त साहित्य उपलब्ध है परन्तु जिला सुल्तानपुर में वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों की भुमिका पर अत्यन्त ही कम साहित्य उपलब्ध है |
सिंह अ0, (2018) के अनुसार , भारतीय समाज में मद्यपान का सेवन बहुत पहले से ही होता आ रहा है | और आज भी लोग मद्यपान का उपयोग करते हैं लेकिन आधुनिक समय में नशे की वस्तुओं के अनेक विकल्प हो गये हैं जो मद्यपानी व्यक्ति और सम्पूर्ण समाज दोनों को ही खोखला करते जा रहे हैं | मद्यपान का बढ़ता हुआ शौक हमारे भारतीय समाज को विशेषकर युवाओं के लिए एक अभिशाप बन गया है | शुरुवात में व्यक्ति शराब का सेवन करता है बाद में शराब व्यक्ति का सेवन करने लगती है |
ठेनुआ सिंह, बी0, श्रीवास्तव दी0. धाकड़ सिंह प0, ( 2018 ) के अनुसार, मद्यपान एक शारीरिक तथा मानसिक अवसाद की स्थिति है और मद्यपान निम्न स्नायविक प्रणाली की अपेक्षाकृत एक उच्च मानसिक केन्द्र को अधिक तीव्र गति से प्रभावित भी करता है | जिससे मद्यपानी व्यक्ति के सामान्य कार्य करने की शक्ति और भावनाओं की अभिव्यक्ति की क्षमता भी नष्ट हो जाती है | मद्यपान के कारण शारीरिक प्रभाव जैसे थकावट, हाथ पाँव में कम्पन, स्वयं के पैरों में लड़खड़ाहट, बात करने में अस्पष्टता आदि लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं | मद्यपान का प्रभाव सिर्फ मद्यपान व्यवहार तक ही सीमित नहीं रहता वरन यह सांस्कृतिक परम्पराओं एवं सामाजिक परिस्थितियों को भी को भी सामान्यतः प्रतिबन्दित करता है |
आंकड़ा स्रोत एवं विधितन्त्र
शोध समस्या से सम्बंधित तथ्यों का संकलन एवं विश्लेषण प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक, स्रोतों के द्वारा किया गया है | शोध क्षेत्र में सर्वेक्षण से पूर्व शोध समस्या से सम्बंधित उपयुक्त पुस्तकों, प्रकासित शोध पत्रों आदि का उचित अध्ययन किया गया है | शोध समस्या के लिए क्षेत्र में सर्वेक्षण के लिए साक्षात्कार एवं प्रश्नावली का प्रयोग किया गया है | 200 मद्यपान उपभोगियों से साक्षात्कार के माध्यम से तथ्यों से प्राप्त आंकड़ों का संकलन तथा विश्लेषण का कार्य किया गया है |
शोध में प्रयुक्त संख्यकीय
प्रस्तुत शोध कार्य में प्रतिशत संख्यकीय का प्रयोग किया गया है |
वाहन चालक के रूप में बढ़ती दुर्घटना में मद्यपानी अभिभावकों का योगदान
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उत्तरदाताओं की अभिमत आवृति |
आवृति |
प्रतिशत |
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कोई प्रभाव नहीं |
36 |
18 |
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नकारात्मक प्रभाव |
146 |
73 |
|
कह नहीं सकते |
18 |
09 |
|
योग |
200 |
100.0 |
तालिका में वर्णित प्राथमिक आकंडे के माध्यम से विश्लेषण के द्वारा यह स्पष्ट होता है कि सर्वेक्षित शोध क्षेत्र में कुल 200 उत्तरदाताओं में से 18 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यह स्वीकार किया कि एक वाहन चालक के रूप में मद्यपनी अभिभावकों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता | लेकिन मद्यपान का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है इसकी स्वीकृति 73 प्रतिशत लोगों ने दी है | अतः इस शोध के द्वारा यह स्पष्ट होता है कि वाहन चालक के रूप में मद्यपानी अभिभावकों का प्रभाव पड़ता है |
समाधान
1. मद्यपान की स्थिति में वाहन चलाना एक कठोर दंडनीय अपराध है | सरकारी नियमों को और सख्त किये जाये और इन नियमों का सख्ती से पालन हो |
2. मद्यपान करने वाले व्यक्ति को नशा मुक्ति केन्द्र में जाने के लिए प्रेरित करना चाहिए |
3. जनसंचार के माध्यम से लोगों में जागरूकता लायी जाये उन्हे मद्यपान के दुष्परिणामों से अवगत कराया जाये जिससे वे मद्यपान को छोड़ सकें |
4. आये दिन हो रही सड़क दुर्घटनाओं से मद्यपानी व्यक्ति को अवगत कराया जाये |
5. मद्यपानी व्यक्ति को काउंसलिंग करायी जाये और उन्हे इस अभिशाप से मुक्त करने का प्रयत्न किया जाये |
6. मद्यपान के नशे में गाड़ी न चलाये मद्यपानी व्यक्ति की इस बात का ध्यान रखने का विशेष उत्तरदायित्व उसके परिवार के अन्य सदस्यों का है क्योंकि मद्यपानी व्यक्ति के साथ अधिकतर उसके घर वाले ही रहते हैं | जो उसे मद्यपान की स्थिति में वाहन का प्रयोग करने से पूरी तरह रोक सकते हैं |
7. पूरे भारत में सरकार को शराब पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए | तभी संभवतः इस समस्या का समाधान निकाल सके |
निष्कर्ष
सुल्तानपुर में आये दिन यातायात सम्बन्धी दुर्घटनाएं होती रहती हैं | उसमें से ज्यादातर दुर्घटनाएं तभी हुई है जब चालक नशे में थे | सरकार भी इस दिशा में कठोर नियम ला रही है बस इसका सख्ती से पालन हो यह आवश्यक है | अभिभावक अपने बच्चों के लिए एक मिशाल होते हैं | अभिभावकों को मद्यपान से दूर रहना चाहिए जिससे उनके बच्चे भी मद्यपान से दूर रहे और जिससे दुर्घटनाओं पर नियन्त्रण बना रहेगा | मद्यपान पर रोक लगाकर ही बढ़ती दुर्घटनाओं को रोक जा सकता है |
सन्दर्भ सूची
1. सिंह अ0, (2018), मदात्ययियों की व्यक्तिगत और सामाजिक विशिष्टताएँ, इंडियन जे एसओएस, 05, 107-112|
2. ठेनुआ सिंह, बी0, श्रीवास्तव दी0. धाकड़ सिंह प0, (2018), राजस्थान राज्य के भरतपुर जिले के विशेष सन्दर्भ में मद्यपान के कारण एवं दुष्परिणाम, शृंखला एक शोधपरक वैचारिक पत्रिका, 5, 8, 77-81 |
3. आहूजा रा0,(2000), सामाजिक समस्याएँ, जयपुर एवं नई दिल्ली, रावत पब्लिकेशन्स |
4. DAS, S. K. et al (2006) Alcohol: its Health and Social impact in India. The National Medical Journal of india. Vol. 19. No. 2.
5. गौड़ सास्वत अ0- जीवन अवधि विकास, स्टार पब्लिकेशन्स, आगरा, भारत |
6. शर्मा सु0 (2007) स्वास्थ्य समस्या और समाधान, विश्वभारती पब्लिकेशन्स: नई दिल्ली 110002, भारत
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Received on 20.06.2025 Revised on 19.07.2025 Accepted on 24.08.2025 Published on 12.11.2025 Available online from November 19, 2025 Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(4):205-208. DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00033 ©A and V Publications All right reserved
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